Safflower Cultivation : कुसुम कम पानी, कम लागत में अधिक उपज देने वाली फसल है। इसके अंकुर मिट्टी में गहराई तक जाते हैं। अधिक गहराई से नमी और पोषक तत्वों को अवशोषित करता है। कुसुम तेल में संतृप्त फैटी एसिड की मात्रा अन्य तेलों की तुलना में बहुत कम है। इसलिए रक्त में कोलेस्ट्रॉल की मात्रा अधिक नहीं बढ़ती है। यह तेल हृदय रोगियों के लिए उपयोगी है। कुसुम कि फसल के लिये मध्यम काली भूमि से लेकर भारी काली भूमि का उपयोग किया जाता है। कुसुम की उत्पादन का सही लाभ लेने के लिये इसे गहरी काली जमीन मेें ही बोना चाहिये। इस फसल की जड़ें जमीन में गहरी जाती है। कुसुम फसल के बीजों को बोनी करने के पाहिले बीजोपचार करना आवश्यक होता है जिससे कि फफूंद से लगने वाली बीमारियों न हो।
कुसुम की फसल की खेती के लिए मध्यम से भारी मिट्टी का चयन करना चाहिए। यह फसल 45 सेमी से अधिक गहरी मिट्टी में अच्छी तरह उगती है। इसी प्रकार भूमि में जल निकास अच्छा होना चाहिए। यदि पानी जमा हो गया तो फसल को नुकसान होगा। इस फसल को थोड़ी नम मिट्टी में भी उगाया जा सकता है।
कुसुम की फसल लगभग 130 से 140 दिनों में कटाई के लिए तैयार हो जाती है। पत्तियाँ एवं फलियाँ पीली पड़ने पर ही कटाई करनी चाहिए। जैसे-जैसे फसल पकती है, पत्तियों के साथ-साथ फूल भी सूख जाते हैं और सख्त हो जाते हैं। इसलिये कुसुम की फसल की कटाई सही समय पर करना बहुत जरूरी है।
कुसुम के खेती के लिये प्रति हेक्टेयर 15 से 20 किलोग्राम उपचारित बीज की आवश्यकता होती है। इसके बाद बीज को कतारों में लगाएं कुसुम के बीज के फल चिकने और सख्त होते हैं। थोडे दिनो बाद जब ये फुल ओर पत्तियों सुख जाती है। इसके कटाई करते समय इस के कांटे हाथ-पैरों को घायल कर देते है। कुसुम की कटाई के दौरान मजदूरों की समस्या आम बात हो गई है। इसलिए देखा जा रहा है कि किसान कुसुम बोने से परहेज कर रहे हैं।